गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

यात्री .


मौन , मै अनजान फिर बोलो कहां आवास मेरा !
*
जिन्दगी की राह रुकने को नहीं विश्राम-बेला ,
आज है यदि साथ लेकिन कल कहीं रहना अकेला !
आज आ पहुँची यहाँ कल लौट जाना ही पडेगा ,
और यह परिचय पहीं पर छोड जाना ही पडेगा !
स्मृतियाँ अनगिन बनी रह जायँगी उर भार मेरा !
*
इन्हीं दो परिचय क्षणों मे ,आज हँस लो बोल भी लो ,
फिर नहीं अवकाश होगा , आज गाँठें खोल भी लो ,
मै नहीं प्रतिबन्ध कोई भी लगाना चाहती हूँ ,
इसी क्रम में ,मित्रवत् ,तुमको समाना चाहती हूँ !
मै प्रवासी ,कहीं बसने का नहीं अधिकार मेरा !

मै स्वयं ही पास आती ,पर यहाँ से दूर जाना ,
रह न जायेगा मिलन के हेतु फिर कोई बहाना !
मंजिलें ये जिन्दगी की विवश रुकती जा रही हूं ,
प्रति चरण पर नेह का उपहार धरती जा रही हूँ !
मोह भर मन साथ पा ले यह नहीं सौभाग्य मेरा !
*
राह मे इस भाँति कितने सुहृद् छूटे ,बन्धु छूटे ,
भार उर पर रह गया सम्बन्ध के सब तार टूटे !
दुख कहीं भी देख मन ,जीने स्वयं लगता उसीको ,
शान्ति से वंचित करूँ क्यों साथ मे लेकर किसी को ,
इन्हीं दो परिचय क्षणों के छोर पर अभियान मेरा !
*
रोक पाये कौन मुझको .ये न चंचल पग थमेगे ,
कौन बाँधेगा,न ये उन्मुक्त बन्धन मे बँधेंगे ,
इसी जीवन यात्रा मे मोह भी है द्रोह भी है ,
है अगर आरोह पहले बाद मे अवरोह भी है
एक उलझन सी अबूझी कौन सा हो नाम मेरा !
*
आज के आवेग बन रह जायँगे बस एक कंपन ,
एक परिचय बन रहेगा आज का यह स्नेह-बंधन !
दो दिनो का साथ देकर याद लेती जा रही हूं ,
औ' तुम्हारे भाव अपने साथ लेती जा रही हूँ ,
आँसुओं के मोल होता हास का व्यापार मेरा !
*
अब यहाँ तो तब वहाँ ,कोई नहीं मेरा ठिकाना ,
आज जी बहला रही हूँ ,शेष है कल दूर जाना ,
आज आई हूँ यहाँ पर है यही मेरी कहानी ,
और स्मृति- शेष होगी एक भूली सी निशानी ,
चार प्रहरों की अवधि फिर तो घिरेगा ही अँधेरा !
*
दो क्षणों से बना जीवन ,यही परिचय ,और क्या दूँ
हास भी है अश्रु भी है अधिक इस से साथ क्या लूं ?
कामना छलना जहाँ औ' शब्द भी हों जाल केवल
भावना अभिनय बने ,लेकर बढूँ मै कौन संबल ,
एक निश्चितत गति भले हो पंथ सीमाहीन मेरा !
*
इस अकेली यात्रा मे राग से वैराग्य तक की ,
मै बनी बेमेल मेले मे ,अनेकों बार भटकी ,
उसी स्नेहिल दृष्टि का अभिषेक चलती बार पा लूँ ,
कर्ण-कुहरों मे गहन ,आश्वस्ति देते स्वर समा लूँ
क्या पता अनिकेत मन लेगा कहाँ जाकर बसेरा !
*
दूर हूं पर पास हूँ मै ,पास हूं पर दूर भी हूं ,
एक परिचय हूं सभी की .दो दिनो की मीत भी हूँ ,
चल रही ,पाथेय लेकर ,जगत की जीवन व्यथा का ,
फिर नया अध्याय रचने के लिये अपनी कथा का ,
मुक्त पंछी मै जहाँ रह लूँ वहीं पर नीड मेरा !
*
यह थकन पथ की, विसंगतियों भरी जीवन -कथा यह,
अनवरत यह यात्रा ,अनुतप्त भटकाती व्यथा यह !
कर्म जो कर्तव्य, मै चुपचाप करती जा रही हूँ,
जगत के अन्तर्विरोधों से गुजरती जा रही हूँ,
यहाँ कुछ अपना न था, क्या नकद और उधार मेरा !
*
रखा जाता यहाँ पर पूरा हिसाब-किताब पल -छिन ,
कर लिया तैयार कागज, बाद मे दीं साँस गिन-गिन !
अब अगर लिखवार ने पूछा ,कहूँगी -' खुद समझ लो !
प्रश्न मुझसे क्यों ,अरे ,लिक्खा तुम्हीं ने,तुम्हीं पढ लो ;
निभा दी वह भूमिका ,जिस पर लिखा था नाम मेरा ! '
*
कहां मेरा जन्म था होगा कहाँ अवसान मेरा
मौन , मै अनजान ,फिर बोलो कहां आवास मेरा !
*
शकुन्तला जी ,
आपने कविता का स्मरण किया .मैं आभारी हूँ (पहले भी मुझसे इसके लिये जिनने कहा - उनकी भी) 
 अपने ब्लाग 'यात्रा - एक मन की ' पर से इसे यहाँ
स्थानान्तरित कर रही हूँ .
- प्रतिभा.

24 टिप्‍पणियां:

  1. कहां मेरा जन्म था होगा कहाँ अवसान मेरा
    मौन , मै अनजान ,फिर बोलो कहां आवास मेरा !


    स्तब्ध हूँ इस रचना को पढ़कर .....
    मुझे गर्व है कि मैं आपसे परिचित हूँ और आपके पाठकों में से हूँ !
    सादर

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  2. बेहद गहन अभिव्यक्ति है और सच को भी मुखरित कर रही है।

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  3. राह बड़ी है, हमराही हैं, पर हर पग तो अपना ही है। सुन्दरतम अभिव्यक्ति जीवन की।

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  4. रखा जाता यहाँ पर पूरा हिसाब-किताब पल -छिन ,
    कर लिया तैयार कागज, बाद मे दीं साँस गिन-गिन !
    अब अगर लिखवार ने पूछा ,कहूँगी -' खुद समझ लो !
    प्रश्न मुझसे क्यों ,अरे ,लिक्खा तुम्हीं ने,तुम्हीं पढ लो ;
    निभा दी वह भूमिका ,जिस पर लिखा था नाम मेरा ! '
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज के आवेग बन रह जायँगे बस एक कंपन ,
    एक परिचय बन रहेगा आज का यह स्नेह-बंधन !
    दो दिनो का साथ देकर याद लेती जा रही हूं ,
    औ' तुम्हारे भाव अपने साथ लेती जा रही हूँ ,
    आँसुओं के मोल होता हास का व्यापार मेरा !
    *बेहद सवेनशील एवं गहन अभिव्यक्ति...बहुत ही शानदार लिखा है आपने समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  6. इन्हीं दो परिचय क्षणों मे ,आज हँस लो बोल भी लो ,
    फिर नहीं अवकाश होगा , आज गाँठें खोल भी लो ,
    मै नहीं प्रतिबन्ध कोई भी लगाना चाहती हूँ ,
    इसी क्रम में ,मित्रवत् ,तुमको समाना चाहती हूँ !
    मै प्रवासी ,कहीं बसने का नहीं अधिकार मेरा ...

    The lines made me emotional. Thanks for this beautiful creation...

    .

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  7. aaj to antas ke rag,anurag, vyatha ke sabhi rang dikha dale. bahut hi samvedansheel likha hai...ham sab aap jaisi naav par hi sawaar hain...sabke man me aise hi bhaav hain...fark itna ki kon apne ehsaso ko kaise shabdo ki shaktTa de pata hai. bahut man ko chhoone wali abhivyakti....sacche bhaavo ko ukerti sunder prastuti hai.

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  8. कल १७-१२-२०११ को आपकी कोई पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  9. कर्म जो कर्तव्य, मै चुपचाप करती जा रही हूँ,
    जगत के अन्तर्विरोधों से गुजरती जा रही हूँ,

    मन को भावविभोर कर देती है यह कविता।


    सादर

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  10. ये रचना तो मैंने पहले भी पढ़ी थी ... पर मेरी टिप्पणी नहीं दिख रही ...

    फिर से पढ़ कर मन आनंदित हो गया ...
    रोक पाये कौन मुझको .ये न चंचल पग थमेगे ,
    कौन बाँधेगा,न ये उन्मुक्त बन्धन मे बँधेंगे ,
    इसी जीवन यात्रा मे मोह भी है द्रोह भी है ,
    है अगर आरोह पहले बाद मे अवरोह भी है
    एक उलझन सी अबूझी कौन सा हो नाम मेरा !

    पूरी रचना ही मन को बाँध लेने वाली है .. पर ये पंक्तियाँ कुछ विशेष हैं ..

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  11. क्या ही प्रवाह है इस भाव विभोर करती सुन्दर रचना में....
    बाँध लेती है पंक्तियाँ....
    आदरणीय प्रतिभा जी सादर बधाई और आभार....

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  12. "कहां मेरा जन्म था होगा कहाँ अवसान मेरा
    मौन , मै अनजान ,फिर बोलो कहां आवास मेरा !"

    भावों की प्रचुरता...
    शब्दों की मधुर संयोजन......
    सुन्दर और उत्कृष्ट रचना.....

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  13. कहां मेरा जन्म था होगा कहाँ अवसान मेरा
    मौन , मै अनजान ,फिर बोलो कहां आवास मेरा !


    -अद्भुत...बहुत सुन्दर.

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  14. मैंने ये कविता 'साहित्य कुंज' पर पढ़ी थी...फिर 'यात्रा..' की सहयात्री बनी...और तब आपसे परिचित भी नहीं थी बहुत...डरते सहमते आपको अधूरी कविता पर अपने मनोभाव मेल किये थे। और आपने ....आपने मुझे पूरी कविता भी भेजी थी ।
    आज पुन: पढ़ी रचना तो इन तीन पंक्तियों में मन सिमट आया...
    ''दुख कहीं भी देख मन ,जीने स्वयं लगता उसीको ,
    शान्ति से वंचित करूँ क्यों साथ मे लेकर किसी को ,
    इन्हीं दो परिचय क्षणों के छोर पर अभियान मेरा !''

    इन्हें हृदय और माथे से लगा कर एक और बात कहनी है....आपकी अनकही आज्ञा के साथ :)

    'जब पहली बार पढ़ी थी...उस क्षण जो सोचा था अधूरी कविता पर..आपको जो लिखा...wo bina edit kiye आज यहाँ भी post कर दे रही हूँ......कविता के साथ ही संलग्न रहने चाहिए इस कविता पर मेरे ह्रदय के भाव भी...(..और उस अधूरी और इस सम्पूर्ण कविता के अंतिम छंद एक ही हैं...)'
    _

    ''
    प्रतिभा जी,
    अंतिम छंद के लिए तो आखें मूँद कर बस वंदन है..और नमन है इस कविता को.......अदभुत प्रवाह है...बेहतरीन रचना...और इतनी सरल कि सीधे एक ही बार में ह्रदय तक पहुँच गयी और बुद्धि को भी छूकर आई. ...और इसके लिए विशेष आभार...मैं इस कविता के एहसासों को छूना चाहती थी...मन में महसूस करना चाहती थी...जो मैं कर सकी...अच्छा हुआ आपने एकदम शुद्द हिंदी के शब्द नहीं प्रयुक्त किये...वरना मैं वंचित रह जाती इस अबाध कविता के साथ बह जाने के सुख से....

    शायद आपकी पहली कोई रचना जिससे मैं चाहकर भी स्वयं को जोड़ नहीं पायी...तात्पर्य है की आपने जो जादू बाँधा है...उससे बाहर आना ही नहीं हुआ......

    बहुत बहुत बहुत सारी बधाई नहीं दूगी......आज मेरी तरफ से बहुत सारा स्नेह आपको...:)
    क्यूंकि आज बहुत दुविधा में थी किसी वजह से..आपकी कविता से अनजाने में ही दिशा सी मिल गयी....

    मैंने ब्लॉग पर ढूढी ये कविता पर नज़र नहीं आई कही (halanki bahut samay lekar nahin dhooodh paayi thi..:( kshama karein)...तो इसी के द्वारा आपको सदेश प्रेषित कर रही हूँ........''

    -

    बहुत आभार शकुन्तला जी का भी...:) उनके कारण ही अधिक से अधिक पाठकगण इस कविता को पढ़ पायेंगे....

    आभार आपको भी :) !!

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  15. अद्भुत भाव प्रवाह ...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  16. इस अकेली यात्रा मे राग से वैराग्य तक की ,
    मै बनी बेमेल मेले मे ,अनेकों बार भटकी ,
    उसी स्नेहिल दृष्टि का अभिषेक चलती बार पा लूँ ,
    कर्ण-कुहरों मे गहन ,आश्वस्ति देते स्वर समा लूँ
    क्या पता अनिकेत मन लेगा कहाँ जाकर बसेरा !


    जीवन का शारांश ...बहत सुन्दा अद्भुत

    उत्तर देंहटाएं
  17. अब अगर लिखवार ने पूछा ,कहूँगी -' खुद समझ लो !
    प्रश्न मुझसे क्यों ,अरे ,लिक्खा तुम्हीं ने,तुम्हीं पढ लो ;
    निभा दी वह भूमिका ,जिस पर लिखा था नाम मेरा ! '
    ....जीवन के गहन दर्शन का अद्भुत प्रवाहमयी चित्रण...बहुत सुंदर..आभार

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  18. जीवन और कर्तव्य पथ पर चलते हुए अनुभूतियों का सम्यक काव्यात्मक वर्णन :)

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  19. सुंदर प्रवाह भावविभोर करती अति सुंदर रचना,.....

    मेरे पोस्ट के लिए "काव्यान्जलि" मे click करे

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  20. शकुन्तला बहादुर23 दिसंबर 2011 को 10:34 pm

    प्रतिभा जी,आपका अतिशय आभार और विलम्ब के लिये खेद ।
    पुनः पढ़कर भी चिरनूतन सी इस कविता ने मन को प्रफुल्लित कर दिया।जीवन के यथार्थ की दार्शनिक अभिव्यक्ति ने अभिभूत कर दिया।
    काव्यात्मक सुन्दर प्रवाह के साथ भावविभोर करती इस अद्भुत रचना
    की प्रशंसा करने में मैं स्वयं को अक्षम अनुभव कर रही हूँ।

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  21. यह कविता मैंने कितनी बार पढ़ी है, इसकी गिनती नहीं मेरे पास।
    लेकिन जैसा शकुन्तला जी ने कहा है, चिरनूतन है यह काव्य, प्रवाह, कथ्य, सम्प्रेषण।
    आभार कहूँ तो निःसंदेह कम होगा, प्रणाम कर लूँ वही श्रेयस्कर है।
    अच्छा है जो आपने यहाँ बाँटा इस कविता को।

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  22. आदरणीय प्रतिभा जी,
    ये टिप्ण्णी मौन मैं अनजान बोलो फ़िर कहाँ आवास मेरा के लिए है...
    आप क्या इसे कृपया पोस्ट कर देंगी, जाने क्यों मुझ से पोस्ट नहीं हो रही है :
    अद्भुत! अतिसुन्दर! बार-बार-बार-बार पढ़ी , गुनी जाने लायक! ये कविता है या जादू ! अभी तो इस के भाव और शब्द के सम्मोहन में हूँ ...बाद में पूरी टिपण्णी लिखूंगी कभी...आपने अब तक मुझे ये दिखाई क्यों नहीं थी प्रतिभाजी!
    सादर - शार (शार्दुला).

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