शनिवार, 27 अगस्त 2011

अभी बहुत आहुतियाँ बाकी.



*
यज्ञ अभी तो शुरू हुआ है ,समिधायें चेती हैं अब तो,
अभी फूल-फल अक्षत रोली दे-दे कर  पूजा है सबको,
अभी होम का धूम उठेगा    ,कडुआहट से दृष्टि आँजने 
 अभी आँच से दूर हाथ हैं ,सघन ताप का क्रम है बाकी .

अभी नारियल तन का  धरा समूचा , फोड़ा किया न अर्पित ,
देवि चंडिका कहाँ हुई  हैं अभी रक्त-चंदन से चर्चित
खप्पर कहाँ भभूति भस्म बन हुआ साधकों के हित रक्षित
तन की राख व्यर्थ काहे को , पावन हो भभूति बन जाती .
*
समिधाओं की ज्वालायें हत हो, मंद न पल भर को हो पाये ,
हवन कुंड में आहुतियों के अर्पण का क्रम टूट न जाये ,
 पुरश्चरण तक कोई भी व्यवधान ,विघ्न ना आये आड़े  
  होता  आहुति बन बैठा रक्ताभ हुईं आवेशित आँखी ,
*
अभी न श्रीफल चढ़ा वेदिका , कैसे अधबिच भोग चढ़ाये
अभी कहाँ यजमान ,स्वस्ति-वाचन को अंजलि में जल पाये ! 
अभी राख तल में बैठी है अभी उड़ रही हैं चिन्गारी  ,
दहके अंगारों से उठती लपटें अभी कहाँ हैं नाची !
*.
अभी पुरोहित मंत्र पाठ कर  ,बोल उठेगा ,स्वाहा-स्वाहा
चूक न हो जाये कि  कुंड से हट कर  व्यर्थ नसाये काया ,
होम गंध यों व्यापे सारा कल्मष-कपट हवा हो जाये 
दुर्निवार आमंत्रण की ध्वनि ,आर-पार दिशि छोर  कँपाती ,
*
और प्रज्ज्वलित हो यह ज्वाला ,थोड़ी घी की धार समर्पो  ,
भर दो   थाल   हवन सामग्री तन-मन प्राणों का मिश्रण दो
ओ यजमान ,तुम्हारा व्रत पूरा हो, पुरे सभी मनचाहा
महायज्ञ की अग्नि दहकती, मंत्र-पाठ की ध्वनि घहराती !
अभी बहुत आहुतियाँ बाकी !


- प्रतिभा.
*

11 टिप्‍पणियां:

  1. होम गंध यों व्यापे सारा कल्मष-कपट हवा हो जाये
    दुर्निवार आमंत्रण की ध्वनि ,आर-पार दिशि छोर कँपाती ,

    प्रतिभा जी, आपकी पावन प्रतिभा को नमन.
    अति सुन्दर प्रेरक प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  2. यह यज्ञ आश्चर्यचकित कर देने वाले निष्कर्ष देगा।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर अभिब्यक्ति /आह्वान करती हुई शानदार रचना /बधाई आपको /



    please visit my blog.thanks.
    www.prernaargal.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. बिल्कुल सही कहा अभी बहुत सी आहुतियाँ बाकी हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही अहुंतियां देनी है।
    अभी तो संकल्प भर हुआ है।
    यज्ञ और अनुष्ठान तो अब शुरु होंगे।
    पूर्णाहुति में देरी है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. अभी नारियल तन का धरा समूचा , फोड़ा किया न अर्पित ,
    देवि चंडिका कहाँ हुई हैं अभी रक्त-चंदन से चर्चित
    खप्पर कहाँ भभूति भस्म बन हुआ साधकों के हित रक्षित
    तन की राख व्यर्थ काहे को , पावन हो भभूति बन जाती ....

    Great !
    very inspiring creation !

    .

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत अच्छा प्रयास है आपके बधाई हो आपको!

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुंदर कविताएँ लिखती हैं आप!
    आपकी पिछली कविताएँ भी देखीं मैने।
    आपमें लय की ‘सिद्धि’ अच्छी है, दूसरी तरफ आपकी कविताएँ व्युत्पत्ति की धनी हैं। ( जैसे ‘रचयिता’ कविता ) इसे आपकी शब्द-समृद्धि और संदर्भ-समृद्धि से बावस्ता होकर जाना जा सकता है।

    आपके ब्लोग का फीड सँजो लिया है, नीक ब्लोग समझकर! बहुत आभार आपको, आगे काव्यस्वादाय आता रहूँगा।

    सादर..!

    उत्तर देंहटाएं
  9. कोई शब्द नहीं...बस नमन है आपकी लेखनी को प्रतिभा जी!!

    उत्तर देंहटाएं