मंगलवार, 12 जनवरी 2010

सुमिरनी हो गई रे

तेरा रट-रट के नाम घनश्याम ,सुमिरनी हो गई रे !
जहाँ जाऊं न पाऊँ कोई आपुना ,
मोरे नयनो में तेरी ही थापना
कहीं पाऊँ न चैन ,जिया दुखे दिन-रैन
मन लेवे कहीं ना विसराम, सुमिरनी हो गई रे !
*
चिर दिन भटका किया जियरा ,
बस तुझे पहचाने मेरा हियरा
कोई नाता न माने ,कैसे किसे पहचाने
मेरा कोई न धाम कोई काम,सुमिरनी हो गई रे
*
अब इतनी तो तू कर सँवरिया ,
रह जाऊँ नहिं बीच डगरिया ,
होवे सीतल तपन मन होवे मगन
जा पहुँचूँ वृंदावन धाम, सुमिरनी हो गई रे !

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन

    Sanjay kumar
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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