बुधवार, 6 जनवरी 2010

बाकड़िया बड़

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बाकड़िया बड़
यहाँ पर एक बरगद था पुरातन पूर्वजों जैसा
जटायें भूमि तक आतीं तना सुदृढ़ असीसों सा
*
मुझे तो दूर से पल्लव- हथेली हिल बुला लेतीं
ज़रा ले छाँह बाबा की थकन तो दूर कर लेतीं .
वही उज्जैन का वट-वृक्ष बाकड़िया जिये कहते
कि जिसका नाम लेकर लोग फिर अपना पता देते .
न भूलूँगी अरे ओ वट प्रियम् संवाद कुछ दिन का !
*
मुझे लगता कि यह छाया ,पिता की गोद जैसी है ,
थकन के बाद, थपकी से मिले आमोद जैसी है
पितर सम हर सुहागिन पूजती, आँचल पकड़ झुकती
लपेटे सूत के दे , व्रत अमावस का सफल करती
उसी की छाँह में भीगा हुआ विश्वास कुछ दिन का
*
कि जैसे दीर्घवय मुनि जटिल, अपने बाहु फैलाये
धरे आशीष की मुद्रा ,स्वस्ति औ' शान्ति से छाये
पखेरू कोटरों में बसा कर परिवार रहते थे
घने पत्ते दुपहरी में सुशीतल छाँह देते थे
बहुत कुछ जो घटा सदियों वही तो एक साक्षी था ,
*
मुझे तो याद है बरगद तले अपना खड़ा होना ,,
नगर को छोड़ते पर उन असीसों से नहा लेना ,
उसे छूना, वहाँ की याद आँखों में समा लेना
बहुत-कुछ धर निगाहों में , विकल मन से बिदा लेना ।
वहीं के भवन ,वह अभ्यास औ आवास कुछ दिन का ,
*
उसे क्यों काट फेंका यों किसी का क्या बिगाड़ा था ,
पुरानी उस धरोहर को ,सभी से प्यार गाढ़ा था ।
बताओ काटने वालों ,तुम्हारे हाथ थे कैसे !
कभी क्या महत् तरुवर फिर उगा लोगे उसी जैसे ?
यही लगता, कि अब चुक जायगा यह राग कुछ दिन का !
यहाँ पर ज़िन्दगी भी क्या, बड़ा खटराग कुछ दिन का!
*

2 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर शब्दों के साथ बहुत सुंदर रचना.....

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  2. 'थकन के बाद, थपकी से मिले आमोद जैसी है '
    वाह! बहुत बहुत खूबसूरत उपमा....एकदम से वो एहसास मन में आ समाया..जब बहुत थक कर आती थी स्कूल से या कहीं से भी..तो माँ बालों को सहला के पूछतीं थीं...,''..थक गयी...चल थोडा सा खाले फिर आराम कर लेना...'' :)
    वाकई..बहुत प्यारी पंक्ति लगी ये.....

    'पुरानी उस धरोहर को ,सभी से प्यार गाढ़ा था '
    प्यार तो गाढ़ा था..मगर इंसान काहे अपना प्यार इतना गाढ़ा नहीं कर पाता..:(....? मैं क्या आपसे पूछ रहीं हूँ मैं तो खुद उन्ही में से हूँ.....हमारे हॉस्टल में पेड़ कटवाने की मुहिम शुरू हुई.हम सब सहेलियां बड़ी भावुक हैं..सब की सब बेहद उदास थीं........मगर हमने सिर्फ उदास होने का खोखला काम किया....सिर्फ संवेदनाएं दे दीं ....और आपकी कविता के समापन की तरह अपने अपने कामों में लग गए.......:( हम चाहते तो शायद सबको इकठ्ठा करके उन बड़े विशाल बरगद के पेड़ों को बचा सकते थे......कितने पंछी वहां से उड़े..कितने मरीजों का चूल्हा उनके नीचे जला करता था......:(
    खैर...अबकी कभी हुआ..तो गलती नहीं दोहरौंगी...आवाज़ ज़रूर बुलंद करुँगी....ये बात भूल सी गयी थी...आपकी कविता का शुक्रिया फिर से याद दिलाया और दृढ़ किया इस संकल्प को..:)

    'बताओ काटने वालों ,तुम्हारे हाथ थे कैसे !
    कभी क्या महत् तरुवर फिर उगा लोगे उसी जैसे ?'

    ये एक नयी बात मिली पढने में...बाक़ी बातें तो कहीं कहीं कविताओं में पढने मिलतीं रहीं हैं...ये दो पंक्तियाँ सर्वथा नवीन लगीं.....बहुत ही अच्छा प्रश्न..??मगर शायद सिर्फ काटने वालों के लिए नहीं है.....मेरे जैसे गांधीजी के बंदरों के लिए भी है......:(

    'यही लगता, कि अब चुक जायगा यह राग कुछ दिन का !
    यहाँ पर ज़िन्दगी भी क्या, बड़ा खटराग कुछ दिन का!'

    (क्षमा कीजियेगा मगर यहाँ ज़िन्दगी की जगह ''जीवन'' पढ़ा मैंने....ज़िन्दगी उर्दू उर्दू लग रहा था..इसलिए..:( )
    हम्म.....बहुत ही व्यवहारिक समापन..और यथार्थ में भी यही तो होता है......

    वो पेड़ के ज़रिये घर के पते बताने वाली बात भी बहुत भली लगी.....बहुत सूक्ष्मता से आम जीवन की बातें इस कविता में मिलीं हैं......

    इस भली रचना के लिए आभार.......:)

    एक प्रश्न घुमड़ रहा है बार बार......क्या सच में उज्जैन में आपका ऐसा कोई पेड़ था...मेरा मतलब है...जैसे मैं अपने बचपन वाले घर के गुलमोहर के पेड़ से बेहद जुड़ीं हुईं हूँ....क्या आपका भी ऐसा कोई साथी पेड़ था..??

    (sorry technical problem ki wajah se baar baar post karne par hi koi comment publish ho raha hai...:(...kshama )

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