सोमवार, 14 दिसंबर 2009

यहाँ बस हूँ

यहाँ दिन है वहाँ तो रात होगी !
नयन भर स्वप्न की माया तुम्हारे साथ होगी !
*
यहाँ तो धूप इतनी सिर उठाने ही नहीं देती ,
नयन को किसाकिसाती उड़ रही है किरकिरी रेती
वहाँ तो चाँदनी की स्निग्ध-सी बरसात होगी
*
इधर की हवा कुछ बदली हुई बेचैन लगती ,
किरण इन मरुथलों में भटकती सी भरम रचती ,
वहाँ विश्राम होगा , चैन की हर सांस होगी .
*
बने हर बात का तूफ़ान, मन बस चुप अकेला ,
दिखाई दे रहा बस ,दूर तक सुनसान फैला ,
यहाँ बस हूँ ,वहाँ तो साथ होगा दोस्ती आबाद होगी .

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. अपनी दोस्त की याद आ गयी ये पंक्तियाँ पढ़ कर...........
    लगा था..हलकी फुलकी पंक्तियाँ हैं...मगर अंत में मन भीग गया.....कुछ यादें ताज़ा हो गयीं...

    ''वहाँ विश्राम होगा , चैन की हर सांस होगी .''

    ये पंक्ति उस अंतरे में तो बहुत भली भली लगती है...मगर प्रतिभा जी...अंत वाले छंद के साथ यही पंक्ति शूल की तरह चुभती है.........कुछ शब्द याद आ गए...इसी विश्राम वाली बात पर...

    ''पीड़ादायी है ये विवशता जब स्वयं को विवश न पाती हूँ,
    फिर भी सहती हूँ वेदना स्वयं पर अंकुश लगाती हूँ..''

    कोई अपना सात समंदर पार सुकून से न हो तो उससे जुड़े हुए कैसे चैन से रह सकते हैं ना प्रतिभा जी......??

    ''बने हर बात का तूफ़ान, मन बस चुप अकेला ,''

    इसी पंक्ति में व्यक्त दशा के साथ कविता का समापन किया .....
    अच्छा लगा इस कविता को पढ़ना...अपनी स्मृतियों में खोना....

    बधाई कविता के लिए...प्रतिभा जी!

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