सोमवार, 12 सितंबर 2016

सार्थक रहने दो शब्दों को --

*
क्या  शब्द था - दिव्य !!!
जैसे प्रसन्न आकाश , मुक्त,भव्य ,असीम .
कितना सार्थक दीप्त त्रुटिहीन .

अर्थ का अनर्थ ,
घोर अपकर्ष ,कैसी  मनमानी वंचना शब्दों से ,
कर डाला ,अपूर्ण ,विकल , विहीन.
*

 संज्ञा बदलने से गौरव  नहीं मिलता,  
 बिंब-प्रतिबिंब-सा
 है  दृष्य और दृष्टि का संबंध .
पूर्ण कौन  यहाँ ?
कहीं न कहीं सब  अधूरे .
और यही विकलता की तड़प 
नये मार्ग खोल, सारी क्षति पूर्ति के साथ 
नये अर्थ देती है .
*
 व्यक्तित्व से पाते हैं शब्द  
अर्थ और  उत्कर्ष -
जैसे सूर ,
अंधत्व को सूरत्व से प्रतिस्थापित , 
जैसे रैदास हीनता को
 गुरुत्व प्रदान कर गये .
जैसे एक दृष्टिहीन 
औरों को बना गया  समर्थ,
शब्दों का स्पर्श  दे कर .
*
एक और शब्द - हरिजन .
कितने सम्मान का पात्र रहा . 
 गिरा  डाला इसे भी -
खो बैठा वास्तविक अर्थ  और गरिमा 
बन गया  हत-नत कृपाकांक्षी   .
*
मत करो शब्दों की छीछालेदर ,
 सार्थक-समर्थ  निर्मल रहने दो ,
कि भाषा के अपने संसार में 
 पूरे अर्थ के साथ ज्योतित रहें.
आगत को संचित संस्कार देते   
अपनी विद्यमानता से 
चिरकाल धन्य करें !
*
प्रतिभा सक्सेना.