सोमवार, 19 मई 2014

मंगलमय हो !

    युग की करवट
        *
        देख रही हूँ अपनी आँखों ,
        युग को करवट बदलते.
        कितना शोर था
        कीचड़ में उछलते लोग
        शोर ,छींटे ,बौखलाहटें ,
        कितनी बार ,कितने रूप ;
        और हर बार
        और,और गिरावट .
        *
         उठा था कभी 

         एक परिव्राजक का शंखनाद -
        "नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से,
        भड़भूँजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से;
        निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।"
        झकझोर दिया था जिसने जन-मानस !
        वह नरेन्द्र #था .
        *
        धार वही नामाक्षर
        मिल गया  प्रत्युत्तर .
        निकल आया
        हाट से, बाज़ार से,
        सामान्य ही विशिष्ट बन,
        माँ के प्रकाश -स्नान हेतु.
        अपरिग्रही जीवन की आरती लिए !     

    *
        लक्ष-लक्ष करांकित सहस्रमाली
        अश्व-वल्गाएँ सँभाल,
        रथ-चक्रों से तमस् विदारता ,
        स्याही के धब्बे खँगारता,
        रोशनाई घोल  लिख दे ,
        नये युग का उपोद्घात !
        *
        शमित  हों सारे  उत्पात ,
        निर्मल हो गगन ,वायु ,
        क्षिति ,जल-प्रवाह.
        जाग उठे नया  विश्वास ,
        शुभमय हो , मंगलमय ,
        अरुणोदय का नया उजास !
        *
        (# नरेन्द्र-स्वामी विवेकानन्द)
     -  प्रतिभा सक्सेना

      सोमवार, 12 मई 2014

      छापे माँ तेरे हाथों के

      ( जीवन-धारा के प्रवाह में माँ के साथ जिये हुए  तरल-सरल अंतरंग पल ,  पुत्री   के स्मृति-भँवर में  अनायास उमड़ कर कुछ करुण-मधुर  संवेदनाएं जगा जाते हैं.  उसी की अभिव्यक्ति ,मेरी मित्र श्रीमती शार्दुला नोगजा रचित यह  कविता , सहयोगी जनों के आस्वादन हेतु प्रस्तुत है -)

          
        छापे माँ तेरे हाथों के  - 
       

      कोहबर की दीवारों जैसे 
      मेरे अन्तर के आँगन में ,
      धुँधले से, पर अभी तलक हैँ 
      छापे माँ तेरे हाथों के !
      *
      कच्चे रंग की पक्की स्मृतियाँ 
      सब कुछ याद कहाँ रह पाता ,
      स्वाद, खुशबुएँ, गीतों के स्वर
      कतरे कुछ प्यारी बातोँ के !
      *
      हरदम एक मत कहाँ हुये हम ,
      बहसों की सिगड़ी में तापीं 
      दोपहरों के ऋण उतने ही  
      जितने स्नेहमयी रातों के!
      *
      छापे माँ तेरे हाथों के, 
      कतरे कुछ प्यारी बातोँ के !
      *
      सादर 
      शार (शार्दुला) .
      ११ मई '१४

      शुक्रवार, 9 मई 2014

      कृतारथ कर दिया ओ माँ !

      ( उस परम- जननी ने  नारी जन्म  दे कर  जो 'माँ' बनने का गौरव  प्रदान किया -    कृतज्ञता -ज्ञापन हेतु 'विश्व-मातृ-दिवस' पर अपनी एक पूर्व  कविता  प्रस्तुत करने  से स्वयं को रोक नहीं पा रही हूँ. ) 
      *
      सृजन की माल का मनका बना कर जो ,
      कि नारी तन मुझे देकर कृतारथ कर दिया ओ माँ !
      *
      सिरजती एक नूतन अस्ति अपने ही स्वयं में रच
      इयत्ता स्वयं की संपूर्ण वितरित कर परं के हित
      नए आयाम सीमित चेतना को दे दिए तुमने
      विनश्वर देह को तुमने सकारथ कर दिया, ओ माँ !
      *
      बहुत लघु आत्म का घेरा कहीं विस्तृत बना तुमने
      मरण को पार करता अनवरत क्रम, जो रचा तुमने
      कि जो कण-कण बिखरता, विलय होता, नाश में मिलता,
      नये चैतन्य का वाहन, पदारथ* कर दिया ओ माँ !
      *
      कि नारी तन मुझे देकर, कृतारथ कर दिया ओ माँ !
      *
      अमृतमय स्रोत जीवन का प्रवाहित कर दिया तन में,
      लघुत्तम जीवधारी को जनम-अधिकार दे तुमने.
      रहस्यों की गुहा में धर तुम्हीं साकार कर पाईं,
      प्रकृति के बीज मंत्रों को यथारथ कर दिया ओ माँ !
       *

      - प्रतिभा.
      (*पदारथ = मणि)