मंगलवार, 29 मार्च 2011

वही मैं

*

जब होती हूँ अपने आप में

वर्जना-हीन ,अबाध, मुक्त .

अपनी पूरी मानसिक सत्ता के साथ,

इन मानो-प्रतिमानो से निरपेक्ष.

किसी का कहना सुनना

कोई अर्थ नहीं रखता मेरे लिए !

आत्म में निवसित ,

शीष उठाए संनद्ध ,

अविभाजित ,अनिरुद्ध ,

अपनी संपूर्णता में स्थित !

वही हूँ मैं ,

बस वही !
*

गुरुवार, 17 मार्च 2011

वाह रे ,चाँद !

*
वाह रे ,चाँद !

तुम्हें भी चैन नहीं पड़ता !

इतना पानी बरसा

आसमान तो क्या साफ़ होता

सारे में किच-किच और हो गई .

काले-काले दल-दल बादल जहाँ-तहाँ .
*
तुम भी चाँद ,बाज़ नहीं आते

खेल रहे दौड़-दौड़ छिपा-छिपी !

बात ,सुनते ही नहीं

फिसल रहे बार-बार .

उफ़, वहीं लोट गए ,

दल-दल -बादल में डूबी -सी देह .
*

चलो उठो, उठो ,

साबुन लगा कर नहला दूँ .

चलो साथ ,

धुले पुछे, फिर से चमक जाओगे !

*

कोई मत आना .

सारे कपड़े उतार

नहा रहा है मेरा चंदा .

हँसते फेन-बुलबुलों वाली हर-हर गंगा !
*

आसमान में बादल दल-दल,

धुला-पुँछा चंदा चमक गया रे !

कोई नज़र न लगा दे

ये लो, काजल का टीका .

वाह,

है कोई मेरे चंदा सरीखा !

*

रविवार, 13 मार्च 2011

ओ अरुणा !

*

बहुत अस्थिर हो उठती हूँ ,

पल-पल अनुभव करती हूँ तुम्हें अपने में ,

कि नींद में चलती चली आती हो मुझ तक !

अरुणा,

सैंतीस साल बीत गए

लोग जगाना चाहते हैं !

जगोगी?

बड़ी मुश्किल होगी ,

झटके पर झटके .

आँखें फाड़ देखोगी चतुर्दिक

सब अजनवी ,

माँ-पिता भाई-बहिन मित्र संबंधी,

कहींकुछ नहीं .

ख़ुद का वजू़द एक सवाल-सा .

दर्पण से ताकेगी

टूटी-हारी ढली एक पस्त औरत.

अपने को कहां ढूँढोगी ,

कैसे पार पाओगी ?

*

तुम जो थीं -

अंतर में रह-रह फूटता

आनन्द का उत्स,स्वप्निल नयन,

मधु- गंध व्याकुल पुष्पित पुलकित

यौवन भार नत,

प्रतीक्षाकुल तरुणा-अरुणा

 समर्पित होने अपने  प्रिय पुरुष को !

एक पिशाच लीला रौंद गई ,

ऊर्जा के अमृत-कण खींच ,

रोम-रोम में तेज़ाब उँडेल गई .

*

पच्चीस साल की युवती

जो सो गई थी उस दिन,

कभी नहीं जगेगी .

सामने है हत विद्रूप ,

ढहता जा रहा भग्नावशेष !

*

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

मुक्त कर दो अब मुझे -

*
कब से ,

छटपटा रही हूँ

कुचली हुई विरूप देह के पंजर में .

रोम-रोम जकड़ा

वहीं के वहीं जड़ीभूत

आहत मन ,

पल-पल तड़पते

प्राणों की रगड़.

*

सैंतीस साल !

दारुण यंत्रणा ,

सच पर अड़ने का ,

नारी होकर नर के आगे

न झुकने का दुस्साहस .

परिणाम ?

*

परिणाम ?

यही -मैं ,

कभी रही थी -

अरुणा शानबाग.

आज उदाहरण मात्र !

टू़टी -फूटी खंडित देह की कारा ,

वही  भयंकर भूमिका

निश्चेत, जकड़ा  मन ,

न जीवन न मृत्यु,

अहर्निश ,असह्य !

*

उदाहरण बनी पड़ी हूँ ,

सँजोओगे कब तक ,

मानवी देह का उपहास ?

या नारीत्व ही एक शाप !

सिमटी-लिपटी ममी हूँ ,

या ज़िन्दा लाश ?

*

दे दो अब छुटकारा !

मत बाँधे रहो

साँसों की जर्जर डोर ,

कटे इस जनम का पाप,

बस मुक्त कर दो ,

मुक्त कर दो अब मुझे !

*

सोमवार, 7 मार्च 2011

नचारी - काहे सरमाति है !


दूध- जल कोऊ लाय तुमका समर्पि देय,

नाँगेँ बैठ जहाँ-तहाँ तुरतै न्हाय लेत हो!

लाज करौ कुछू ज्वान लरिकन के बाप भये,

ह्वै के पुरान-पुरुस नेकु ना लजात हो.

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''ऋद्धि-सिद्धि बहुरियाँ घरै माँ, तहूँ सोचत ना.

भाँग औ'धतूरा बइठ अँगना माँ खात हौ!

लाभ-सुभ बारे पौत्र, निरखत तुम्हार रंग ,

माई री, मैं देखि धरती माँ गड़ी जात हौं !''

*

हँसे नीलकंठ,''जनती हतीं रीं गौरा,फिन

काहे लाग माय-बाप हू की सीख ना सुनी!

तोहरे ही कारन गिरस्थी स्वीकार लई,

काहे हठ धारि लियो मोर दुल्हनियाँ बनी ?

*

''लोग हँसे तो का ,आधे अंग में धरे हों तोहि,

मेरे साथ-साथ तू भी उहै जल न्हाति है,

आध-आध दोऊ जन साथ-साथ देखें सब,

मोर-तोर प्रीत, अइस काहे सरमाति है !''

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पल्लू मुँह दाबे ,हँसे जाय रहीं पुत्र-वधू ,

ऋद्धि-सिद्धि आँगन तिरीछे से नैन भे,

चौकी पे बैठे गनेस झेंप-खीज भरे,

समुझैं न माय-बाप ही सों जाय का कहैं !

*